हाँ मैं सुंदर हूँ...ये तीन शब्द हर कोई अपने आप को कहना चाहता है...और खुद को हम कितना महत्व देते हैं..वो इस बात से पता चलता की ग्रुप फोटो में हम सबसे पहले.अपने आप को देखते हैं.. अगर हमारी पिक अच्छी आयी है तो हम कहते हैं अच्छी फ़ोटो है...नहीं तो हम कहते हैं की कितनी बेकार फ़ोटो है..और सेल्फी का चलन जबसे चला है तब से लोगो ने मुँह टेढ़ा करना शुरू कर दिया है...अपने होठों को गोल कर के पिक खींचने वाली लड़कियां मतलब कभी तो अपने आप को ग़ौर से देखो तुम कितनी अजीब लगती हो ऐसी शक्ल बना कर.. भगवान से डरो.. अच्छी खा़सी शक्ल को तुमने कब गुलेल जैसा बना लिया तुम्हे पता भी नहीं चला..मुझे लगता है लोग अपनी शक्ल शायद इसलिए टेढ़ी करते हैं की वो कैमरा में दुबले लगे..और कोई कारण तो मुझे नहीं समझ आता..भला करे ऊपर वाला उनका।
ऊपर वाले से याद आया बुद्ध द्वारा कही गयी ये पंक्ति "आत्म दीपो भव:"...क्या मुश्किल है इस काम को करना.. कि हम स्वयं अपने दीपक बन जाये..हम तो सिर्फ अपना आइना ही बने हुए हैं इस सेल्फी के युग में..और अगर हम अँधेरे में हैं तो हमारा आइना भी हमें अँधेरा ही दिखाएगा...अपने आप को दिया बना लेने का क्या उपाय है... कि हम अपनी ही रौशनी में आगे बढ़ जाएँ..किसी और के मोहताज़ न रहें...वैसे बातें बहुत होती हैं व्हाट्सप्प पर...कोई एक इंसान हाथ खड़ा करे जिसने अपने अंदर के रावण को मार लिया है...आपको अपने आप में कोई बुराई दिखेगी तब तो आप उसे ख़त्म करोगे न.. मुझे बस एक बात समझ आती है की आपको रोज़ बढ़ना चाहिए...तन से नहीं मन से..बुद्धि से..ज्यादा नहीं तो चुटकी भर...क्यूँकि एक चुटकी बढ़त की कीमत बहुत है व्हाट्सप्प बाबू
Wednesday, 4 October 2017
सेल्फ़ी युग
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